अंध श्रद्धा भक्ति 👉🏻 खतरा-ए-जान

अंध श्रद्धा का अर्थ है बिना विचार विवेक के किसी भी प्रभु में आस्था करके उसे प्राप्ति की तड़प में पूजा में लीन हो जाना।  फिर अपनी साधना से हटकर शास्त्र प्रमाणित भक्ति को भी स्वीकार न करना। दूसरे शब्दों में प्रभु भक्ति में अंधविश्वास को ही आधार मानना। जो ज्ञान शास्त्रो के अनुसार नही होता, उसको सुन-सुनाकर उसी के आधार से साधना करते रहना। वह साधना जो शास्त्रो के विपरीत है, बहुत हानिकारक है। अनमोल मानव जीवन नष्ट हो जाता है। जो साधना शास्त्रो में प्रमाणित नही है, उसे करना तो ऐसा है जैसे आत्महत्या कर ली हो। आत्महत्या करना महापाप है। इससे अनमोल मानव जीवन नष्ट हो जाता है।



शास्त्रविधि को त्यागकर मनमाना आचरण करना यानी अज्ञान अंधकार के कारण अंध श्रद्धा के आधार से भक्ति करने वाले का अनमोल मानव (स्त्री-पुरुष का) जीवन नष्ट हो जाता है,, क्योंकि पवित्र श्रीमद्भागवत गीता अध्याय 16 श्लोक 23 में बताता है कि-
जो साधक शास्त्रविधि को त्यागकर अपनी इच्छा से मनमाना आचरण करता है यानि किसी को देखकर या किसी के कहने से भक्ति साधना करता है तो उसको न तो कोई सुख प्राप्त होता है, न कोई सिद्धि यानि भक्ति की शक्ति प्राप्त होती है, न उसकी गति होती है।
मतलब साफ है शास्त्रविरुद्ध साधना करने से कोई फायदा नही है। 
वर्तमान में पूरे विश्व मे संत रामपाल जी महाराज जी के अतिरिक्त शास्त्रों के अनुसार सम्पूर्ण अध्यात्म ज्ञान तथा सम्पूर्ण भक्ति विधि किसी के पास नही है।

अधिक जानकारी के लिए "जीने की राह" पुस्तक जरूर पढ़ें,, जिसमे सभी वेदों और शास्त्रों से प्रमाणित ज्ञान है। 

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